Aakhir Ham Jeevan Se Chahte Kya Hai | आखिर हम जीवन से चाहते क्या है – Mahatma Gautam Buddha

Aakhir Ham Jeevan Se Chahte Kya Hai | आखिर हम जीवन से चाहते क्या है – Mahatma Gautam Buddha

Aakhir Ham Jeevan Se Chahte Kya Hai | Mahatma Gautam Buddha: बुध कहते है इंसान दो ही गलतिया करता है। एक तो शुरुआत ही नहीं करना, और दूसरी शुरुआत करना मगर रास्ता पूरा तय नहीं करना। लेकिन ये रास्ता है क्या। रास्ता तो आप जानते ही है। जब आपको कहीं भी पहुंचना है तो एक रास्ता तो तय करना ही पड़ता है।
Aakhir Ham Jeevan Se Chahte Kya Hai
Aakhir Ham Jeevan Se Chahte Kya Hai

बिना रास्ता तय किये आप अपनी मंज़िल तक कभी नहीं पहुंच सकते। अगर आपको अपने घर से थोड़ा दूर जाना है तो भी रास्ता तो तय करना ही पड़ेगा। खैर ये रस्ते तो हम हर रोज तय करते है लेकिन एक रास्ता हम अपने जीवन का भी तय करते है।

लेकिन दुःख की बात तो ये है की हम में से ज्यादातर लोग जन्म से लेकर मृत्यु तक कोई भी रास्ता तय नहीं कर पाते। यहाँ पर हम आपके जीवन के रास्ते की बात कर रहा हूँ। सड़क वाले रस्ते की नहीं। हम लोग जीवन भर किसी एक रास्ते को अपनाकर उस पर चलने की कोशिश करते है।

हमे लगता है की हम उस रास्ते पर चल रहे है लेकिन आप एक जगह ही खड़े रहकर अपने पैर पटकते रहते है। हो सकता है इस बीच आपको मान सम्मान, धन दौलत, और अधिकार सब मिले। क्या आप बस यही चाहते है। क्या यही आपके जीवन का उदेश्य है।

ये सब वो चीज़े है जिसके पीछे हम भागते रहते है। और वह हमें मिल भी जाती है। फिर हम इन्ही चीज़ो से खेलते रहते है। अंत एक बहुत अच्छी चीज है। यानि मृत्यु एक बार हमे इस बात का आभास मृत्यु के समय अवश्य हो जाता है की मै कहीं नहीं गया।
मैंने कोई भी रास्ता तय नहीं किया मैं पहले दिन जहा खड़ा था आज भी वही हूँ क्या हमें धन दोलत, मान सम्मान और अधिकारों के पीछे नहीं भागना चाहिए। नहीं ऐसा नहीं है। ये सब चीजे भी जीवन में जरुरी है। लेकिन जो रस्ते पर नहीं है यानि की रास्ते पर नहीं चल रहा है।
वह केवल चलने का नाटक कर रहा है। उसके पास ये सब चीजे व्यर्थ है। ऐसे व्यक्ति के पास ऐसी चीजे जल्दी ही आती है। लेकिन जल्दी चली भी जाती है। ” मैं ” जितना सुख देखता है उससे कहीं अधिक वह दुःख भी देखता है। ऐसा व्यक्ति सबकुछ होने के बाद भी किसी की मदद नहीं करता।
मंदिर मस्जिद चर्च जहा भी ईश्वर होने की सम्भावना है वहा पर वो इंसान अपनी दौलत लुटाता है। लेकिन बहार किसी भी जरूरतमंद की मदद नहीं करता। और अगर मदद करता भी है तो बदले में उससे कुछ लेने की उम्मीद रखता है।
अगर ऐसे व्यक्ति के पास अधिकार आ जाये तो वह उन अधिकारों से लोगो की मदद नहीं करता बल्कि निर्दोष को सताने का काम करता है। और अपने आप को शक्तिशाली समझता है। अगर वह उन लोगो की मदद करता भी है तो लेकिन उसका भी बढ़ चढ़ कर प्रचार करते।
दिखाते है की हम मदद करने वाले है। हमें पसंद करो हमारा मान सम्मान करो। बस इसी खेल में शाम हो जाती है। और मृत्यु रात्रि बनकर आती है। समय समाप्त हो जाता है लेकिन एक व्यक्ति जो रास्ते पर चल रहा है वह जीवन का ये खेल भी समझ जाता है। (Aakhir Ham Jeevan)
जब उसके पास धन दौलत आती है तो वह सभी की मदद भी करता है पर उसके बदले में वह कुछ नहीं चाहता। वो इंसान जानता है की उसके पास दौलत इसलिए आई है की वह किसी की मदद कर सके। और जब उस व्यक्ति के पास अधिकार आते है तो वह लोगो को उनके अधिकारों के बारे में समझाता है।
अपने अधिकारों से उनके अधिकारों की रक्षा करता है। वह आने वाले पल को शक्ति प्रदान करता है। वह उनके साथ हमेशा खड़ा रहता है। ऐसे व्यक्ति को धन दौलत मान सम्मान और अधिकारों की कोई चिंता नहीं होती। क्योकि वह जानता है की ये सब चीज़े उसके लिए नहीं मिली है।
बल्कि इन सब चीज़ो से वह इस दुनिया में कुछ परिवर्तन ला सकता है। नहीं तो इन सब चीज़ो को लेकर न जाने कितने लोग रोज मर जाते है। और इस व्यक्ति को ये सब ना मिले वह गरीब ही क्यों न हो और भूखा ही क्यों न हो। लेकिन वह अपने एक निवाले को भी दुसरो को देने के लिए तत्पर रहता है।
और इसमें भी वह खुश रहता है। और ख़ुशी भी इतनी की अमिर व्यक्ति भी उसकी ख़ुशी के सामने छोटा पड़ जाए। लेकिन ये रास्ता क्या है बुद्ध किस रास्ते की बात कर रहे है। बुद्ध उस रास्ते की बात कर रहे है जिस रास्ते पे चलकर व्यक्ति स्वयं की खोज करता है।
रास्ता तो आपने कोई ना कोई चुन ही रखा होगा। और अपना रास्ता चुनना भी बड़ी बात होती है। नहीं तो लोग दुसरो के चुने हुए रास्तो पर ही चल पड़ते है। जैसे की कोई भेड़चाल हो। एक भेड़ जिस तरफ जा रही है सभी भेड़े उसके साथ चलने लगती है।
और यही वो लोग है जिन्हे बुद्ध कहते है की दो ही गलतिया हो सकती है एक तो रास्ते पर न चलना, वे कहीं नहीं चलते उनको चलाने वाला व्यक्ति उनको अपने साथ घसीटता रहता है। लेकिन जब कोई व्यक्ति इस भीड़ को छोड़कर अलग खड़ा हो जाता है।
तब वह देख पाता है की वह भीड़ का हिस्सा नहीं है। और वह भीड़ एक गहरी खाई की और बढ़ रही है। और सभी उसमे गिरते ही जा रहे है। क्योकि वह व्यक्ति दूर खड़ा हो गया है। उसे वह भीड़ दिखाई दे रही है। वह खुद को भी देख रह है।
की वह अकेला है उसे दूसरे और रास्ते भी दिखाई दे रहे है। जो उसे उसकी मंज़िल तक पहुंचा सकते है। उसमे भीड़ के आलावा इधर उधर देखने की क्षमता भी उत्पन हो गई है। अब उसे एक रास्ता मिल गया है। यहाँ पर महात्मा बुद्ध कहते है की।
एक तो इस रास्ते पर ना चलना और दूसरा इस रास्ते को पूरा ना करना। वह व्यक्ति रास्ते पर चल तो पड़ा है लेकिन मन में कई दुविधाए है। कहीं मैं गलत रास्ते पर तो नहीं हूँ। जब इतने लोग एक रास्ते पर जा रहे है तो क्या दूसरा रास्ता पकड़ना सही है।
और ज्यादातर व्यक्ति अपने अकेलेपन से घबरा जाते है। वह एकांत को नहीं जान पाते। अकेलापन उनको घेर लेता है। और वह फिर से उस भीड़ का हिस्सा हो जाते है। जहा उन्हें ना ही तो कुछ सोचने की जरूरत है और न ही कुछ विचारने की।
बस एक दिशा में चेहरा करके चलते जाना है। सब चल रहे है उसे भी उनके साथ चलते जाना है। जो होगा वो सबके साथ होगा मेरे अकेले के साथ तो नहीं। इस बात को लेकर मैं आपको एक कहानी सुनाता हूँ।
एक बार कुछ भिक्षु महात्मा बुद्ध के साथ एक गांव में गए। वहा से जेतवन विहार वापिस लोट आये। जैसा की बुद्ध हमेशा कहते थे की हर कार्य को ध्यान पूर्वक देखो। वह सभी भिक्षु उस गांव को बड़ी ध्यान से देखकर आये थे। और शाम को सभी भिक्षु एक साथ बैठकर उस गांव के बारे में बाते कर रहे थे।
जैसे की उस गांव की मिटटी कैसी थी, बालू मिटटी अधिक थी या फिर जमीन पथरीली थी। मिटटी लाल थी या काली थी। वहा के लोग कैसे थे उन्होंने कैसे वस्त्र पहने थे। ऐसी बहुत सी बाते वह उस गांव के बारे में कर रहे थे। बुध्द वहा पर आये और उन्होंने उन सब की बाते सुनी।
तब बुद्ध ने भिक्षुओ को समझाया की तुम सब उस धरती की बात कर रहे हो जो तुम्हारे शरीर के बाहर है। क्या तुमने उस धरती की बात करते समय तुम कैसे हो इस बात पर ध्यान दिया। अच्छा होगा की तुम अगर अपने शरीर का ध्यान करो।
उसके बारे में जानो उससे तुमको साधना में मदद मिलेगी। और तुम अपने रास्ते पर सही प्रकार से चल पाओगे। वहा बैठे भिक्षुओ में से एक भिक्षु खड़ा हुआ और उसने महात्मा बुद्ध से पर्सन किया। बुद्ध क्या हम सही मार्ग पर नहीं है। बुद्ध मुस्कुराए और बुद्ध ने कहा।
एक काम करो बगीचे में जाओ और वहा से ऐसे फूलो को लेकर माला बनाओ जो ठीक प्रकार से ना खिले हो। जिनको कीड़ो ने ख़राब कर दिया हो। जो मुरझा गए हो। वह भिक्षु बुद्ध के कहे अनुसार एक माला बनाकर ले आया। बुद्ध ने फिर से भिक्षु से कहा।
एक माला और बनाकर लेकर आओ जिसमे सारे आधे खिले हुए फूल हो। वह भिक्षु फिर से बुद्ध के कहे अनुसार माला बनाकर ले आया। बुद्ध ने भिक्षु से फिर कहा की जाओ एक माला और बनाकर ले आओ अपने अनुसार जैसा तुम चाहो।
वैसी माला बनाकर लाओ। उस भिक्षु ने बड़े ही सुंदर फूलो का चयन किया आकर में पुरे खिले हुए सुगन्धित अलग अलग तरह के फूल उसने माला में बड़े ही तरिकके से पिरोये। और एक सुंदर माला तैयार की। माला तैयार होते ही वह भिक्षु बहुत खुश हुआ।
और पहला ख्याल उसके मन में आया की ये माला मैं बुद्ध को अर्पण करूँगा।  वह बुद्ध के पास पंहुचा हुए बड़ी ख़ुशी के साथ उसने वह माला बुद्ध को भेंट की। बुद्ध ने कहा की तुमने मुझे तीन माला दी है। इन में से कौनसी माला तुम मुझे देना चाहते हो।
तब भिक्षु ने वो तीसरी माला को हाथ लगाया और कहा की ये माला मैं आपको देना चाहता हूँ। तब बुद्ध ने कहा की जिस प्रकार एक अच्छी माला बनाने के लिए अच्छे फूलो की आवश्यकता होती है। उसी प्रकार हमें अपने जीवन में सभी कर्मो को ध्यान पूर्वक देखना चाहिए।
ताकि हम अपने उन कर्मो से दूर हो सके। जो हमारी माला को दुर्गंध्ग से भरते है। जब हम अपने कर्मो पर ध्यान नहीं देते अपने आप पर ध्यान नहीं देते तो तब हमारी माला वैसी ही तैयार होती है। जैसी की पहली माला थी। और जब  आप पर ध्यान देने लगते है।

तब हमारी माला वैसी बनती है जैसी की दूसरी माला थी। और धीरे धीरे हम ये समझ जाते है की सुंदर माला बनाने के लिए सूंदर कर्मो का होना बहुत ही आवश्यक है। इस प्रकार सूंदर पुष्प चुने जाते है।

और इस प्रकार सूंदर कर्म चुनकर हम अपने रास्ते पर चल सकते है। उसे पूरा कर सकते है तब आपका जीवन वैसे ही महकेगा जैसे की वो तीसरी माला महक रही है।

फिर मिलेंगे दोस्तों एक और नई कहानी ” Aakhir Ham Jeevan Se ” के साथ तब तक अपना ख्याल रखे और हमेशा मुस्कुराते रहिये। आज की हमारी ये कहानी कैसी लगी कमेंट बॉक्स में जरूर लिखना।

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