मन में होने वाली हलचल को कैसे रोके_ एक बौद्ध भिक्षु की कहानी

मन में होने वाली हलचल को कैसे रोके_ एक बौद्ध भिक्षु की कहानी

जीवन बहुत सारी गलतिओ के बाद भी एक नई शुरुआत कैसे करे। हम सभी इस समय किसी ना किसी समस्या से गुजर रहे है। जिसके कारण हमारे जीवन में दुःख और तनाव है। कभी कभी हमें लगता है की हमें एक नई शुरुआत करनी चाहिए।

मन में होने वाली हलचल को कैसे रोके
मन में होने वाली हलचल को कैसे रोके

मगर फिर हम अपने आपको इस काबिल नहीं समझते की हम सबकुछ भूलकर एक नई शुरुआत कर सकते है। हमें लगता है की हम नई शुरुआत इसलिए नहीं कर सकते की हमने अपने बीते हुए समय में बहुत सारी गलतिया की है।

अगर आप भी इस तरह से सोचते है अगर हां तो इस कहानी को सुनने के बाद आप ऐसा चाहकर भी नहीं सोच पाएंगे। यह कहानी है एक बौद्ध भिक्षु और एक किसान की। क्या आपने कभी एक चीज अनुभव की है की जब हम किसी भी पर्सन का उत्तर पूरी ईमानदारी से ढूंढते है तो हमें उस प्रशन का उत्तर मिल जाता है।

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एक गांव में एक किसान रहता था जिसका नाम सुबोद्ध था उस किसान के भीतर कुछ ऐसा था जो हमेशा उसको सांसारिक चीज़ो से हटाकर आध्यात्मिक की तरफ ले जाना चाहता था।

वह किसान जब भी किसी बौद्ध भिक्षु की शांत आभा को देखता तो मन ही मन सोचता की काश मैं भी बौद्ध का भिक्षु बन पाता। मगर अपने परिवार के कारन वो इस विचार को त्याग देता था। पर क्योकि उसके अंदर प्रबल इच्छा थी अध्यात्म को जानने की।

इसलिए वह दुखी रहने लगता है उसकी इच्छा के कारण उसकी जिंदगी में एक सगन दुखः पैदा हो जाता है। उसको समझ में नहीं आता की वो अपनी समस्या का समाधान किस्से पूछे। एक दिन सुबोद्ध अपने खेत में हल चला रहा होता है।

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उस खेत के किनारे से एक बौद्ध भिक्षु गुजर रहे होते है। गर्मी का समय था और सूरज भी अपने पुरे उग्र रूप में था। किसान दौड़कर बौद्ध भिक्षु के पास जाता है। और कहता है महात्मा जी आप इतनी तेज धुप में कहाँ जा रहे हो।

मैं तो वहा जा रहा हु जहाँ मुझे जाना है। परन्तु तुम कहा जा रहे हो। वह किसान उन बौद्ध भिक्षु से कहता है मैं कुछ समझा नहीं। फिर वे बौद्ध भिक्षु कहते है। तुम्हारे चेहरे पे तनाव साफ़ नजर आ रहा है और इस तनाव का सिर्फ एक ही कारण है।

की तुम अपने मार्ग से भटक गए हो मनुष्य को दुखी करने का कोई तरिकका नहीं है जब तक की वह अपने मार्ग से भटक ना जाये। उस भिक्षु की बात सुनकर वो किसान उस बौद्ध भिक्षु के पैर पकड़ लेता है। और रोने लगता है।

बौद्ध भिक्षु से कहता है की आपने तो चमत्कार कर दिया बिना पूछे ही मेरे भीतर क्या चल रहा है ये बता दिया। वे बौद्ध भिक्षु उस किसान से कहते है की मैंने कोई भी चमत्कार नहीं किया है जो मनुष्य के भीतर चलता है वह साफ़ झलकता है।

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इसमें चमत्कार कैसा। वह किसान कहता है लेकिन मैँ तो समर्थ नहीं हूँ ये देख पाने में। वे बौद्ध भिक्षु उस किसान से कहते है तुम अभी अशांत हो इसलिए नहीं देख पर रहे हो।वो किसान वो किसान पूछता है की शांत कैसे होते है।

वे बौद्ध भिक्षु कहते है शांत होना बहुत ही आसान है सबसे पहले आराम से बैठो। और जो मै कह रहा हूँ उसको ध्यान से सुनो। आँखे बंद करो और बोलो की मै उन सभी को क्षमा करता हूँ जिन्होंने मेरे साथ कुछ भी गलत किया है। मै उन सभी को क्षमा करता हूँ जो मेरे दुश्मन थे।

और सबसे पहले मै अपने आपको अपनी सभी गलतियों के लिए क्षमा करता हूँ। अब अपना ध्यान अपने घर पर ले जाओ। ना तो वो घर जिसमे मै रहता हूँ वह मै हूँ। और ना ही मेरा परिवार मैं हूँ और ना ही यह खेत मैं हूँ। और यहाँ तक की ये शरीर भी मै नहीं हूँ।

वे बौद्ध भिक्षु कहते है की अब अपने भीतर उस समस्या पर नजर डालो। जिसके कारन तुम परेशान हो। समस्या मिलने के बाद उसके हल को खोजो। वो किसान बौद्ध भिक्षु से कहता है की महात्मा जी अगर मेरी समस्या का हल मेरे पास होता तो मैं दुखी ही क्यों होता।

आपका विश्वास ही आपका भाग्य निर्धारित करता है।

वे बौद्ध भिक्षु उस किसान से कहते है की सुबोध इस पूरी पृथ्वी पर ऐसी कोई भी समस्या पैदा नहीं हुई है जिसका हल मनुष्य के भीतर ना हो। तुम्हारे भीतर तुम्हारी हर समस्या का समाधान है। मगर तुम इस बात को स्वीकार नहीं कर पाते इसलिए तुम हल तक नहीं पहुंच पाते।

अगर तुम इस बात पर विश्वास करो की तुम हल ढूंढ सकते हो तो तुम सत प्रतिसत हल तक पहुंच ही जाओगे। सुबोध कहता है की महात्मा जी आपकी बात सुनने के बाद मन को बहुत शांति मिली है। वे बौद्ध भिक्षु कहते है की ये तो मनुष्य का स्वभाव है।

मनुष्य अपनी करतियो के कारण ही अपने स्वभाव से अलग होता है। वार्ना शांत रहना तो मनुष्य की परकृति है। वो किसान कहता है की महात्मा जी अब तो आप मेरे साथ है। मगर आपके जाने के बाद मुझे फिर से अशांति घेर लेगी।

वे बौद्ध भिक्षु उस किसान से कहते है की तुमको शांति को प्राप्त करने के लिए किसी बाहरी इंसान की जरुरत नहीं है। महात्मा गौतम बुद्ध कहते है की अपना दीपक खुद बनो। अपनी ख़ुशी के लिए दूसरे पर निर्भर मत रहो।

वह किसान बौद्ध भिक्षु से पूछता है की प्रभु क्या शांति के लिए सन्याश लेना जरुरी है। उसकी बात सुनकर बौद्ध भिक्षु कहते है। यह जरुरी नहीं है की तुम अपना घर परिवार छोड़कर सन्यासी बन जाओ। मगर ये जरुरी है की आप दिन का कुछ समय अपने आप को जानने में लगाओ।

ध्यान में लगाओ। अगर आप एक नई शुरुआत करना चाहते हो तो आज से करो। क्योकि कल तो कल ही आएगा। हा तो  दोस्तों आजकी ये कहानी आपको कैसी लगी कमेंट बॉक्स में जरूर लिखना।

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