क्रोध कामवासना और लालच जैसी बुरी बिमारियो को कैसे खत्म करे? गौतम बुद्ध

क्रोध कामवासना और लालच जैसी बुरी बिमारियो को कैसे खत्म करे? गौतम बुद्ध

अगर आप क्रोध, कामवासना, लालच और अहंकार जैसी बुरी परिवर्तियो से पपरेशान है तो गौतम बुद्ध के जीवन की ये कहानी आपको जरूर समझनी चाहिए।

क्रोध कामवासना और लालच जैसी बुरी बिमारियो को कैसे खत्म करे? गौतम बुद्ध
क्रोध कामवासना और लालच जैसी बुरी बिमारियो को कैसे खत्म करे? गौतम बुद्ध 

एक दिन गौतम बुद्ध सुबह सुबह प्रवचन सभा में अपने भिक्षुओ को प्रवचन देने के लिए पहुंचते है। सभा में इंतजार कर रहे सभी भिक्षु व् अन्य लोग यह देखकर बहुत ही आश्चर्य चकित होते है की बुद्ध प्रवचन सभा में पहली बार अपने हाथ में कुछ लेकर आये है।

बुद्ध के हाथ में एक कपडा होता है। उस कपडे को देखकर भिक्षु व् अन्य लोग सोचते है की बुद्ध प्रवचन सभा में ये कपडा क्यों लाये है। इससे पहले तो बुद्ध ने ऐसा कभी नहीं किया। अवश्य ही इस कपडे को लाने के पीछे बुद्ध का कोई बड़ा परियोजन होगा। बुद्ध बिना कुछ बोले अपने आसन पर बैठ जाते है। और उस कपडे में समान की दुरी पर पांच गांठे लगा देते है।

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उस कपडे में पांच गांठे लगाने के बाद वह उपस्थित सभी लोगो से बुद्ध कहते है की क्या कोई मुझे बता सकता है की ये वही कपडा है। जो पांच गाँठ लगने से पहले था। बुद्ध के सभी भिक्षुओ में से एक भिक्षु खड़ा होता है। जिसका नाम सारिपुत्र होता है।

सारिपुत्र बुद्ध से कहता है की बुद्ध इसका उत्तर देना बहुत ही कठिन है। एक तरह से देखा जाये तो ये वही कपडा है क्योकि इसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है और दूसरी दर्ष्टि से देखा जाए तो पहले इसमें पांच गांठे नहीं लगी थी इसलिए ये कपडा पहले जैसा नहीं है। और जहाँ तक इसकी मूल परकृति का पर्शन है तो वह चाहकर भी बदली नहीं जा सकती।

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इस कपडे का पदार्थ और इस कपडे की मात्रा वही है। अपने भिक्षु की बात सुनकर बुद्ध कहते है तुम सही कहते हो सारिपुत्र। मै अब इन गांठो को खोल देता हूँ।  इतना कहके बुद्ध  कपडे के दोनों सिरों को पकड़कर एक दूसरे से विपरीत दिशा में खींचने लगते है। उस कपडे को खींचते खींचते बुद्ध अपने भिक्षुओ से कहते है प्रिय भिक्षु तुम्हे क्या लगता है।

क्या इस प्रकार इस कपडे को खींचने से ये गांठे खुल सकती है क्या। बुद्ध का भिक्षुक सारिपुत्र खड़ा होता है और कहता है नहीं बुद्ध इस प्रकार तो आप इन गांठो को और सूक्ष्म बना देंगे और फिर इनका खुल पाना बहुत ही मुश्किल हो जायेगा।  सारिपुत्र का उत्तर सुनकर बुद्ध कहते है ठीक है तुम मेरे अंतिम प्रशन का उत्तर दो।

बुद्ध सारिपुत्र को कहते है की मुझे इन गांठो को खोलने के लिए क्या करना चाहिए। सारिपुत्र बुद्ध से कहते है इसके लिए मुझे सर्वप्रथम निकटता से यह देखना होगा की ये गांठे कैसी लगाई गई है।  इसके ज्ञान किये बिना मैं इन्हे खोलने का उपाय नहीं बता सकता। अपने भिक्षु की बात सुन बुद्ध कहते है तुम सही कहते हो।

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सारिपुत्र यही जानना सबसे आवशयक है यही आधारभुत प्र्शन है बुद्ध कहते है की यहाँ उपस्थित सभी लोगो से मैं यह कहना चाहता हूँ जिस समस्या में आप आज पड़े हो उससे बहार निकलने के लिए ये जानना बहुत ही जरुरी है की आप इस समस्या से ग्रस्त क्यों हुए। यदि आप इस बुनियादी प्र्शन पर ध्यान नहीं देंगे आपके जीवन की समस्या घटने की बजाय बढ़ती रहेंगी।

और आप ये सोच सोच कर जीवन भर रोते रहेंगे की आखिर हम गलती क्या कर रहे है। इस दुनिया में सभी लोग ऐसा ही कर रहे है। वे पूछते है हम कामवासना, क्रोध, लालच और अहंकार जैसी बुरी परिवर्तियो से बहार कैसे निकले। लेकिन वे कभी ये नहीं पूछते की हम इन बुरी परिवर्तियो में पड़े ही क्यों है।

आपका विश्वास ही आपका भाग्य निर्धारित करता है।

बुद्ध जो कहना चाहते है वो ज्यादातर लोग बुद्ध के कहने से ही समझ गए होंगे जो लोग नहीं समझे है उनको मैं सरल शब्दों में समझाना चाहूंगा। इस कहानी में कुछ बाते ध्यान देने योग्य है पहली बात बुद्ध के प्रशन पूछने के बाद सारिपुत्र बुद्ध को उत्तर देता है जहाँ तक मूल प्रकर्ति का प्रशन है तो वह चाह कर भी नहीं बदली जा सकती।

भले ही आपको लगता हो की आपका जीवन बेकार है इसमें बहुत सारी गलत आदतों की गांठे लगी हुई है। पर आपको ये नहीं भूलना चाहिए की ये गांठे खोली जा सकती है। पर सबसे पहले जो जरुरी बात है वो ये है की आपको इन्हे खींचकर और मजबूत करना बंद करना होगा। तभी ये गांठे खुल पाएगी।

दूसरी बात बुद्ध सारिपुत्र से पूछते है की इन गांठो को खोलने का क्या उपाय है सारिपुत्र बुद्ध से कहते है बुद्ध इन गांठो को खोलने के लिए मुझे सर्वप्रथम निकट जाकर ये देखना होगा की ये गांठे कैसी लगाई गई है। अपने दुःख को ख़त्म करने के लिए व्यक्ति दो ही काम कर सकता है। पहला ” चिंता ” और दूसरा ” चिंतन “

चिंता आपको चिता तक ले जाने का कार्य करती है और चिंतन आपको सत्य तक। पर इन सब बातों के बाद जो सबसे जरुरी बात है। वो ये है की आप क्या चुनना चाहते है। चिंता या फिर चिता ये निर्णय पूरी तरह से आपके हाथ में है।

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