कामवासना व् अश्लील विचार से मुक्ति कैसे पाए एक बौद्ध भिक्षु और एक इंसान की कहानी

कामवासना व् अश्लील विचार से मुक्ति कैसे पाए एक बौद्ध भिक्षु और एक इंसान की कहानी

भगवान् गौतम बुद्ध कहते है की बुरी संगति में रहने से अच्छा है अच्छी संगति में रहना। और अच्छी संगति में रहने से अच्छा है अकेले रहना। क्योकि अगर आप अकेले किसी मार्ग पर चलते है तो चाहे आप धीरे चले या फिर तेज एक बात निश्चित होती है की आप को पीछे से कोई भी खींचने वाला नहीं है।

कामवासना व् अश्लील विचार से मुक्ति कैसे पाए एक बौद्ध भिक्षु और एक इंसान की कहानी
कामवासना व् अश्लील विचार से मुक्ति कैसे पाए एक बौद्ध भिक्षु और एक इंसान की कहानी

एक छोटी सी कहानी एक बौद्ध भिक्षु और एक व्यक्ति की, ये कहानी आपकी कई समस्याओ का हल है। एक व्यक्ति बौद्ध भिक्षु के पास आता है और उनसे पूछता है मुनिवर मै आपसे एक प्रशन पूछना चाहता हूँ। बौद्ध भिक्षु उस व्यक्ति से पूछते है की क्या पूछना चाहते हो तुम।

वो व्यक्ति उन बौद्ध भिक्षु से कहता है मेरे अंदर कामवासना बहुत ही ज्यादा है। जिसके कारण मै हर समय उस चीज के बारे में सोचता रहता हूँ जो मेरे लिए गलत है। बौद्ध भिक्षु उस व्यक्ति को बड़ा ही सरल उत्तर देते है। बौद्ध भिक्षु उस व्यक्ति से कहते है।

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तो तुम उस बारे में मत सोचो फिर वह व्यक्ति उस बौद्ध भिक्षु से कहता है की इतना सरल नहीं है मुनिवर जितना आप कह रहे है। मैंने उन विचारों को बहुत बार अपने मन में हटाने की कोशिश की है लेकिन वो विचार मेरे मन में बार बार आते है।

मैंने बर्हमचर्य का भी पालन करने का भी प्रयास किया परन्तु मै बर्हमचर्य का भी पालन नहीं कर पा रहा हूँ कृपा कर आप मेरी सहायता करे। वो बौद्ध भिक्षु उस व्यक्ति से कहते है की क्या तुम जानते हो की बर्हमचर्य क्या है। वो व्यक्ति कहता है की कामवासना को त्यागना ही बर्हमचर्य है।

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बौद्ध भिक्षु उस व्यक्ति की बात सुनकर मुस्कुराते है और कहते है की कुछ भी त्यागना बर्हमचर्य नहीं है। सबसे पहले तुमको ये समझना होगा की बर्हमचर्य है क्या। वह व्यक्ति उन बौद्ध भिक्षु से कहता है की कृपा कर आप ही मुझे बताइये की बर्हमचर्य क्या है।

बौद्ध भिक्षु उस व्यक्ति से कहते है। सबसे पहले तो तुम ये समझो की कुछ भी छोड़ना बर्हमचर्य नहीं है। वह व्यक्ति बौद्ध भिक्षु से कहता है की कृपा करके मुझे समझाइये। बौद्ध भिक्षु उस व्यक्ति से कहते है की जब तुम अपने अंदर पूरी तरह से आनंदमय होते हो।

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 आनंद तुम्हारे अंदर फुट रहा होता है। जब तुम आनद की तलाश में किसी और पर निर्भर नहीं रहते। जब तुम आनद को कही बहार नहीं खोजते उस समय तुम बर्हमचर्य की स्थिति में होते हो। बर्हमचर्य का अर्थ है अंदर के आनद को अनुभव करना।

जिसके बाद बहार की किसी भी चीज की कोई भी आवश्यकता नहीं होती है। वह व्यक्ति उन बौद्ध भिक्षु की बात सुनकर कहता है की क्या मै बरह्मचर्य का पालन कर सकता है। वे बौद्ध भिक्षु उस व्यक्ति से कहते है तुम बर्हमचर्य का पालन नहीं कर सकते।

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तुम केवल एक ही काम कर सकते हो। तुम अपने भीतर के आनद को खोज सकते हो। जब वह आनद तुम्हे मिल जायेगा आनंद की तलाश में, सुख की तलाश में बहार नहीं भटकोगे। और जब तुम बहार नहीं भटकोगे तो तुम सोच लेना की बरह्मचर्य का पालन कर रहे हो।

वह व्यक्ति बौद्ध भिक्षु से कहता है की कैसे संभव होगा मुझे क्या करना होगा। बौद्ध भिक्षु कहते है की ध्यान। ध्यान ही एक ऐसा मार्ग है जो तुम्हे बर्हमचर्य तक ले जायेगा। जो तुम्हे तुम्हारे खुद के वास्तविक रूप से मिलवाएगा। अगर तुम ध्यान करते हो तो तुम्हे तुम्हारे प्रशनो के उत्तर खुद ही मिल जायेंगे।

तुम्हे किसी और से अपने प्रशनो के उत्तर मांगने की जरुरत ही नहीं होगी। अगर आप अपने जीवन को उसकी सर्वोत्तम स्थिति में जीना चाहते है तो आपको ध्यान करना ही चाहिए। अगर आप ध्यान करते है तो ये आपके जीवन में एक नया बदलाव आपको देखने को मिलेगा।

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