इंसान जैसा सोचता है वैसा ही बन जाता है – By Gautam Buddha

इंसान जैसा सोचता है वैसा ही बन जाता है – By Gautam Buddha

एक बार की बात है की गौतम बुद्ध के पास एक इंसान आता है और पूछता है की ये जीवन इतना बुरा क्यों है। जहाँ देखो वहां दुःख ही दुःख है एक समस्या ख़तम नहीं होती और दूसरी शुरू हो जाती है। जीवन में जो पाना चाहता हूँ वो भी नहीं मिल रहा है। हर जगह से नाकामी और हार का सामना करना पड़ता है।

इंसान जैसा सोचता है वैसा ही बन जाता है
इंसान जैसा सोचता है वैसा ही बन जाता है 

ये हमारा जीवन इतना पीड़ादायक क्यों है। गौतम बुद्ध उस इंसान की बातों को सुनकर कहते है की जीवन पीड़ादायक नहीं है। लेकिन तुम्हारा जो जीवन है वो पीड़ादायक है और इसको भी तुम्ही ने बनाया है। वो व्यक्ति बुद्ध से पूछता है की वो कैसे।

बुद्ध उसको समझाता है की हे इंसान आप जो आज सोच रहे हो वही सोच आपके कल का निर्माण करेगी। तुम खुद अपनी सोच का परिणाम हो। जैसा तुम सोचते हो वहां ही तुम बन जाते हो। गौतम बुद्ध की इस बात को सुनकर वहां पर बैठे सभी लोग असहमत थे

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मगर आज इस कहानी के अंत तक आप सभी लोग इस बात से पूरी तरह से सहमत होंगे। की मै इस बात को समझाने के लिए आपको एक कहानी सुनाना चाहूंगा।

बहुत समय पहले की बात है की एक गांव  एक बहुत ही चतुर व्यक्ति रहता था। जो बुद्ध के द्वारा कहीं गई इस बात को गलत साबित करने की ठान लेता है। उस व्यक्ति को जब भी कोई बौद्ध भिक्षु मिलता तो वो उनसे बहस करने का प्रयास करता।

एक दिन वह व्यक्ति एक बौद्ध भिक्षु को रोक लेता है। और उनसे कहता है की मुझे बुद्ध की सभी बातें ठीक लगी परन्तु मुझे ये बात सही नहीं लगी की हम अपनी सोच का परिणाम है भला ऐसा कैसे हो सकता है की व्यक्ति जैसा सोचता है वैसा बन जाता है। इसका अर्थ तो ये हुआ की अगर मैं ये सोचु की इस दुनिया का सबसे धनवान व्यक्ति बन जाऊ तो क्या मै बन जाऊंगा।

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वो बौद्ध भिक्षु कहते है की इसमें कोई भी संदेह नहीं है अगर तुम ऐसा सोच सकते हो तो तुम बन सकते हो। क्योकि जो तुम सोच सकते हो वह तुम बन भी सकते हो। भिक्षु की इस बात को सुनकर वह व्यक्ति क्रोधित हो जाता है। और कहता है की अब तो हद ही हो गई। मुझे आप से ये उम्मीद नहीं थी। की आप भी झूठ बोलेंगे।

बौद्ध भिक्षु उनसे कहते है की तुम मानो या मानो लेकिन यही सत्य है। वो व्यक्ति कहता है की आप मुझे ये बताइये की एक गरीब हमेशा धनवान बनने के बारे में सोचता है और एक भूखा हमेशा स्वादिष्ट भोजन खाने के बारे में सोचता है। तो फिर ये बताओ की एक गरीब हमेशा गरीब क्यों रहता है और एक भूखा हमेशा बेस्वाद भोजन ही क्यों खाता है।

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बौद्ध भिक्षु कहते है की वो गरीब धनवान बनने की सोचता तो है लेकिन उसको अपने सोच पर ही विश्वास नहीं होता। क्योकि वो ये कभी भी नहीं मान सकता की वो भी कभी धनवान बन सकता है। और एक भूखा व्यक्ति अच्छा भोजन खाने की चाहत तो रखता है मगर अपने भीतर वो इस बात को स्वीकार ही नहीं कर पाता की वह कभी इस लायक बन सकता है की वह कभी अच्छा भोजन खा सके।

विचार और सोच में बहुत ही बड़ा अंतर होता है इसको आप कुछ इस तरह समझो की मान लो आपको अँधेरे से डर लगता है और आप अँधेरे में जाते हो और खुद से कहते हो की मुझे डर नहीं लगता। तुम इस तरह की सोच तो सकते हो लेकिन सचाई ये है की तुम अंदर से बुरी तरह डरे हुए हो। वो जो भीतर में गहरा भाव है वो ही तुम्हारी सोच है। और वही सोच तुम्हारे भविष्य का निर्माण करती है।

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गौतम बुद्ध ने इसी सोच के बारे में कहा है लेकिन हम समझते है की हमारे विचार ही हमारी सोच है हमारी सोच विचारों से ही बनती है। मगर उन विचारों से बनती है जिनको हम सच मानते है। उस व्यक्ति को उन बौद्ध भिक्षु की बात समझ में आ जाती है। परन्तु आप के मन में एक सवाल अभी भी जरूर होगा की इस सोच को कैसे बदले।

जो हमारे भीतर गहराई में चलती रहती है। आपको इस प्र्शन का उत्तर देने से पहले मैं आपसे एक प्र्शन पूछना चाहूंगा।  क्या आप खाने में कंकड़ और पत्थर खाना पसंद करते है। 100% आपका उत्तर होगा ” नहीं ” तो फिर इस दिमाग को कचरे से क्यों भर रहे हो। जब आप खुद कचरा नहीं खाते तो इस दिमाग को कचरा क्यों खिला रहे हो।

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